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टेक्नोलॉजी की दुनिया में एक बड़ा धमाका करते हुए, गूगल ने अपने नए क्वांटम प्रोसेसर ‘विल्लो’ (Willow) का एलान किया है। यह चिप क्वांटम कंप्यूटिंग के क्षेत्र में एक ऐसी क्रांति मानी जा रही है, जो आने वाले समय में कंप्यूटर की परिभाषा बदल देगी।

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  1. क्या है गूगल विल्लो?
    विल्लो, गूगल द्वारा तैयार किया गया एक क्वांटम कंप्यूटिंग चिप (Quantum Computing Chip) है। यह उन आम चिप्स (जैसे Intel या Snapdragon) से बिल्कुल अलग है जो हमारे लैपटॉप और फोन में होती हैं। जहाँ नॉर्मल कंप्यूटर ‘बिट्स’ (0 और 1) पर काम करते हैं, वहीं विल्लो ‘क्यूबिट्स’ (Qubits) का इस्तेमाल करता है, जो एक ही समय में 0 और 1 दोनों हो सकते हैं।
  2. इसकी हैरतंगेज रफ़्तार (Speed)
    विल्लो चिप की सबसे बड़ी खासियत इसकी प्रोसेसिंग पावर है। गूगल के मुताबिक:
    असंभव गणना: दुनिया का आज का सबसे पावरफुल सुपरकंप्यूटर (जैसे USA का ‘Frontier’) जिस कैलकुलेशन को करने में 10 सेप्टिलियन साल (1 के आगे 25 जीरो) लेगा, विल्लो ने उसे सिर्फ 5 मिनट में पूरा कर दिखाया।
    इस उपलब्धि को ‘क्वांटम सुप्रीमेसी’ (Quantum Supremacy) कहा जाता है, जहाँ एक क्वांटम कंप्यूटर वह काम कर लेता है जो ट्रेडिशनल सुपरकंप्यूटर के लिए असंभव है।
  3. ‘एरर करेक्शन’ (Error Correction) का समाधान
    क्वांटम कंप्यूटिंग में सबसे बड़ी रुकावट ‘एरर्स’ (गलतियाँ) होती थीं। थोड़ी सी भी गर्मी या कंपन से कैलकुलेशन गलत हो जाती थी। विल्लो चिप ने पहली बार दिखाया है कि जैसे-जैसे हम सिस्टम को बड़ा करते हैं, इसमें एरर्स कम होने लगते हैं। यह क्वांटम कंप्यूटिंग को लैब से निकाल कर असली दुनिया में लाने की तरफ एक बड़ा कदम है।
  4. दुनिया पर इसका क्या असर होगा?
    विल्लो चिप के आने से कई क्षेत्रों में बड़े बदलाव देखे जाएंगे:
    मेडिकल साइंस: नई दवाइयों की खोज और कैंसर जैसी बीमारियों के इलाज के लिए ज़रूरी जटिल आणविक संरचनाओं (molecular structures) की रिसर्च अब महीनों के बजाय दिनों में हो सकेगी।
    AI और मशीन लर्निंग: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इतनी फास्ट और स्मार्ट हो जाएगी कि वह इंसानी दिमाग की तरह सोचने और फैसले लेने के करीब पहुँच जाएगी।
    क्लाइमेट चेंज: नए मैटेरियल्स और एनर्जी-एफिशिएंट सॉल्यूशंस ढूँढने में विल्लो बहुत मददगार साबित होगा।
    साइबर सिक्योरिटी: यह चिप पुराने एन्क्रिप्शन (सुरक्षा) सिस्टम को पलक झपकते ही तोड़ सकती है, इसलिए अब नए तरह की ‘क्वांटम-रेसिस्टेंट’ सुरक्षा की ज़रूरत पड़ेगी।
  5. क्या यह आज के कंप्यूटर्स की जगह लेगा?
    नहीं, फिलहाल ऐसा नहीं होगा। विल्लो चिप को चलाने के लिए बेहद खास हालातों की ज़रूरत होती है:
    इसे डीप स्पेस से भी ज़्यादा ठंडे तापमान (लगभग -273°C) पर रखना पड़ता है।
    इसका साइज और सेटअप बहुत बड़ा और महँगा है।
    इसका इस्तेमाल सिर्फ बड़ी रिसर्च लैब्स और गूगल जैसे क्लाउड प्लेटफॉर्म्स के ज़रिए ही किया जाएगा।

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